गुरु की छत्र – छाया में कल्याण मार्ग का पथिक बनने की एक रोमांचक आध्यात्मिक कथा गुरु गोविन्द दोऊ खडे़, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दिया बताय।। गुरु और गोविन्द दोनों खड़े हैं। मैं किसका चरण स्पर्श करूं? गुरु जी ही बलिहारी हैं, जिन्होंने मुझे परमात्मा का पता बता दिया है। यह उपन्यास रुज़बेह एन. भरुचा के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी उपन्यास ‘द फ़क़ीर’ का सरल हिन्दी रूपान्तरण है, जिसमें न केवल गुरु की महिमा, वरन परोपकार की भावना भी पाठक को अभिभूत करती है और यही उसके कल्याण मार्ग का पथ बन सकता है। अत्यंत हृदयस्पर्शी एवं प्रेरणादायक यह पुस्तक निश्चय ही मानव जीवन को एक नई दिशा प्रदान करने की शक्ति रखती है। रुज़बेह एन. भरुचा अंग्रेज़ी के प्रतिष्ठित लेखक हैं। अंग्रेज़ी में इनके कई यात्रा वृतांत एवं उपन्यास प्रकाशित हो चुके हंै, इसके अलावा कई डाक्यूमैंट्री फिल्मों के निर्माण में भी इन्होंने महत्वपूर्ण स्क्रिप्ट लेखन कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।


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